Indu kumari

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देखा नहीं कल

देखा नहीं कल

 किसी को यूं 
बेआबरू ना कर। 
समय से तो डर। 
कब पासा पलट जाए। 
कोई देखा नहीं कल। 

यह हक तुम्हें ,
किसने दिया है। 
किसी की निजी, 
जिंदगी में दे दखल। 
कोई देखा नहीं कल। 

समय का पलड़ा,
सदा भारी होता है। 
कभी गम के दलदल 
कभी खुशियों के पल। 
कोई देखा नहीं कल। 

अपने वाक्यों पर लगाया,
 जिसने समझ के अंकुश
 शांति मय जीवन में नहीं 
होता कोई हलचल। 
कोई देखा नहीं कल।
    डॉ. इन्दु कुमारी
मधेपुरा बिहार

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बहुत खूब

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